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अब वह दिन नहीं रहे जब युधिष्ठिर का रथ जमीन से दो अंगुल ऊपर चला करता था. कलियुग में वह न सिर्फ वह धरती से लगकर चलता है बल्कि कीचड में दो अंगुल धंसकर चलता है. उनके रथ को अब कीचड से खासा लगाव है, या यों कहें कि धर्मराज का रथ कीचड में ही खिलता है.
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कितनी बड़ी बात थी. शिवजी का धनुष्य बनना. डिजिटल ही सही – बना तो. बनाया था किसीने पिछले 70 सालों में? हाँ हाँ, शिव-धनुष्य 2.0 ऍप की ही बात हो रही है. कैसा धुआंधार प्रचार कर दिया उसका! मानो उस ऍप से ही भस्मासुर मर जाएगा. अब यह दीगर बात है कि असुर को कोई फर्क नही पड़ा – पर आप बीच में मत टोकिए यह सब पूछकर. हमने बता दिया सारे देश को की यह आपको तुरंत खबरदार कर देता है अगर भस्मासुर आस पास कहीं भी हो.
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हमरी न मानो राजदीपवा से पूछो, राजदीपवा से पूछो
राजदीपवा से पूछो, जिस ने sssssssss …..
जिस ने रिया के संग छीना टीआरपी मोरा
इंडिया टुडे ने, इंडिया टुडे ने, इंडिया टुडे ने
इंडिया टुडे ने ले लीना टीआरपी मोरा, टीआरपी मोरा ….टीआरपी मोरा
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तमिलनाडु से सांसद कनिमोझी हाल में दो बार सुर्खियों में रहीं. दोनों घटनाओं का संदर्भ एक ही था- हिंदी की अनावश्यक आक्रामकता! क्या थीं ये दो घटनाएं?
पहली तो थी एक सुरक्षाकर्मी की धृष्टता, जो एक सांसद की भारतीयता को हिंदी समझने की कसौटी पर तोलती है. दूसरी हैं सचिव स्तर के एक केंद्र सरकार के अधिकारी की हिंदी न जानने वाले सदस्यों को- जो शत प्रतिशत भारतीय नागरिक हैं- बैठक छोड़कर जाने की सलाह.
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चतुर लोमडी ने अंगूर की बेल को हसरत भरी नजर से देखा. इस बेल पर उसकी कई दिनो से निगाह थी. पर किसान ने उसे काफी उंचाई पर रखा था और सहेज कर भी ताकि उसे हाथ बढाकर नीचे न खींचा जा सके.
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बादशाह को कमी किसी चीज की नहीं थी. निरंकुश सत्ता, अकूत खजाना, धराशायी विरोधी और दुनिया मे धाक.
पर लोभ किससे संवरण हो पाता है? कहते हैं ना – आदमी का पेट भर जाता है, मन नहीं भरता. उस दिन असावधानी में कुछ ऐसा ही हुआ.
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बादशाह को यह तोता बहुत प्यारा था. जाहिर है हर दरबारी का भी वह प्यारा हो गया. फिर फ़रमान भी तो था – जो कोई व्यक्ति राघू के मरने की खबर सुनाएगा, उस का सर कलम कर दिया जाएगा.